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    भारत की ‘गांडीव’ और मेटियोर: दुश्मन के आसमान पर कब्ज़े की तैयारी

    By November 4, 2025No Comments4 Mins Read

    दक्षिण एशिया के हवाई क्षेत्र में भारत अपनी सामरिक ताकत का लोहा मनवाने के लिए तैयार है। हाल के एक ऑपरेशन में, भारतीय वायुसेना की एस-400 air defence system ने 314 किलोमीटर की हैरतअंगेज दूरी से पाकिस्तानी AWACS को ढेर कर एक विश्व रिकॉर्ड कायम किया। इस सफलता ने हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों की अहमियत को और बढ़ाया है, और भारत इस क्षेत्र में अपनी क्षमता का विस्तार कर रहा है।

    खुफिया जानकारी के अनुसार, हालिया हवाई झड़प के दौरान पाकिस्तान ने चीन निर्मित 10 PL-15 air-to-air missiles का इस्तेमाल किया। भारतीय वायुसेना की प्रभावी प्रणाली ने इनमें से नौ को रास्ते में ही नष्ट कर दिया, जबकि एक मिसाइल भारत की सीमा में आ गिरी। इस क्षतिग्रस्त मिसाइल ने भारतीय वैज्ञानिकों को चीनी मिसाइल प्रौद्योगिकी की गहरी समझ दी और एक नई प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया।

    इसी कड़ी में, भारत का रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) अपने अत्याधुनिक ‘गांडीव’ (Astra-3) मिसाइल पर काम कर रहा है। यह मिसाइल न केवल चीन के PL-15 की पहुंच को मात देगी, बल्कि अपनी अविश्वसनीय गति और सटीकता से दुश्मन को चौंका देगी। उन्नत विकास के इस चरण में, ‘गांडीव’ भविष्य के हवाई युद्ध के परिदृश्य को बदलने के लिए तैयार है, जहाँ दूर तक मार करने वाली और तेज मिसाइलें निर्णायक साबित होंगी।

    दो परमाणु-शक्ति संपन्न पड़ोसियों से घिरा भारत, हवाई क्षेत्र में अपनी श्रेष्ठता सुनिश्चित करने के लिए लंबी दूरी की मारक क्षमता वाली मिसाइलों में भारी निवेश कर रहा है। यह नई पीढ़ी की air-to-air missiles भारत के लड़ाकू विमानों को दुश्मन के हवाई क्षेत्र में प्रभावी ढंग से काम करने और अपने आसमान की सुरक्षा को अभेद्य बनाने में सक्षम बनाएंगी।

    **मेटियोर मिसाइलें: भारतीय राफेल के लिए बड़ा बूस्ट**

    भारत जल्द ही यूरोपियन कंपनी MBDA से लगभग 1,500 करोड़ रुपये की लागत से मेटियोर मिसाइलों की खरीद को अंतिम रूप दे सकता है। रक्षा मंत्रालय की मंजूरी का इंतजार है। ये शक्तिशाली मिसाइलें पहले से ही भारतीय वायुसेना के 36 राफेल लड़ाकू विमानों के साथ तैनात हैं और इन्हें नौसेना के 26 राफेल-M विमानों में भी शामिल किया जाएगा।

    मेटियोर की खासियत उसका रैम्जेट इंजन है, जो इसे लंबी दूरी तक अत्यधिक गति बनाए रखने की क्षमता देता है, जिससे दुश्मन विमानों के लिए बचना लगभग नामुमकिन हो जाता है। इसका उन्नत डुअल डेटा-लिंक सिस्टम पायलट को उड़ान के दौरान भी लक्ष्य बदलने की सुविधा देता है, जो हवाई युद्ध में जीत सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण है। 200 किलोमीटर की अपनी सीमा के साथ, यह वर्तमान में उपलब्ध सबसे प्रभावी beyond-visual-range (BVR) air-to-air missiles में से एक है।

    **रूसी R-37M की आवश्यकता और एस्ट्रा का निरंतर विकास**

    भारतीय वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने रूसी R-37M मिसाइल को “तत्काल आवश्यकता” बताते हुए सरकार से इसके अधिग्रहण में देरी न करने की अपील की है। एयरो इंडिया 2025 में पेश की गई यह सुपरसोनिक मिसाइल 300 किलोमीटर से अधिक की दूरी से बड़े लक्ष्यों जैसे AWACS, टैंकर और बमवर्षक विमानों को नष्ट करने में सक्षम है। रूस ने भारत के साथ इसके संयुक्त उत्पादन की भी पेशकश की है।

    इसी बीच, भारत की अपनी एस्ट्रा मिसाइल परियोजनाएं भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं। Astra Mk-1 पहले से ही Su-30MKI और तेजस विमानों में तैनात है और 100 किलोमीटर से अधिक दूरी तक मार करने की क्षमता रखती है। Astra Mk-2 की मारक क्षमता 200 किलोमीटर तक बढ़ाई जाएगी, और वायुसेना को इसके 700 यूनिट मिलने की उम्मीद है।

    लेकिन Astra Mk-3, जिसे ‘गांडीव’ नाम दिया गया है, सबसे बड़ा परिवर्तन लाएगी। 340 किलोमीटर से अधिक की अनुमानित रेंज के साथ, ‘गांडीव’ को दुनिया की सबसे घातक air-to-air मिसाइलों में से एक के रूप में विकसित किया जा रहा है।

    **एशियाई आसमान में नई शक्तियों का संतुलन**

    भारत का लक्ष्य अगली पीढ़ी की हवाई युद्ध क्षमता में चीन और पाकिस्तान पर निर्णायक बढ़त हासिल करना है। वर्तमान में, पाकिस्तान 145 किलोमीटर रेंज वाली चीनी PL-15E मिसाइल का उपयोग करता है, जबकि चीन के पास PL-15, PL-17 और PL-21 जैसी मिसाइलें हैं जिनकी रेंज 300 किलोमीटर तक है। मेटियोर, R-37M और गांडीव के समावेश से भारत इस अंतर को पाट देगा और आगे निकल जाएगा।

    रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इन उन्नत मिसाइलों की तैनाती के बाद, भारतीय वायुसेना एशिया में सबसे शक्तिशाली air-to-air मिसाइल शस्त्रागार से लैस होगी। यह न केवल भारत की रक्षात्मक क्षमताओं को मजबूत करेगा, बल्कि उसकी आक्रामक शक्ति को भी अभूतपूर्व लचीलापन प्रदान करेगा, जिससे उसका पूरा हवाई बेड़ा एक एकीकृत और अत्यधिक प्रभावी युद्धक बल बन जाएगा।

    DRDO की प्रयोगशालाओं से लेकर भारतीय वायुसेना की अग्रिम चौकियों तक, एक रणनीतिक बदलाव की प्रक्रिया जारी है। हर सफल परीक्षण और हर उन्नयन भारत के आसमान को और सुरक्षित बनाने की दिशा में एक कदम है, एक ऐसी सुरक्षा जो न केवल बचाव करती है, बल्कि विरोधियों पर पूर्ण प्रभुत्व भी स्थापित करती है।

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