Close Menu
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Indian Samachar
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Indian Samachar
    Jharkhand

    संथाल हूल: आदिवासी प्रतिरोध और सांस्कृतिक विरासत का स्मरण

    By July 2, 2025No Comments2 Mins Read

    रांची में 1855-56 के ऐतिहासिक आदिवासी विद्रोह की 170वीं वर्षगांठ को मनाने के लिए एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम, जिसे ‘संताल हूल: आदिवासी प्रतिरोध और विरासत की स्मृति’ शीर्षक दिया गया, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र क्षेत्रीय केंद्र रांची और डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, रांची के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग द्वारा आयोजित किया गया था। विद्वानों, शोधकर्ताओं और छात्रों ने इस आयोजन में भाग लिया, जिसका उद्देश्य आदिवासी प्रतिरोध की स्मृति को पुनर्जीवित करना था।

    इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, रांची के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. कुमार संजय झा ने स्वागत भाषण दिया, जिसमें संथाल हूल के बारे में जानकारी दी गई। उन्होंने बताया कि हूल आदिवासी पहचान, आत्म-सम्मान और सांस्कृतिक संघर्ष का प्रतीक था।

    डॉ. बिनोद कुमार ने ‘हूल’ शब्द की विभिन्न व्याख्याओं पर चर्चा की, और इस बात पर ज़ोर दिया कि 1855 में संथाल हूल ने स्वतंत्रता की वास्तविक लड़ाई शुरू की। उन्होंने सिधो-कान्हो, चांद-भैरव और फूलो-झानो जैसे नायकों की बहादुरी को सराहा।

    डॉ. आरके नीरद ने ऐतिहासिक शोध में सटीकता और प्रामाणिकता के महत्व पर चर्चा की। उन्होंने आलोचनात्मक विश्लेषण के महत्व पर भी ज़ोर दिया, जो विशेष रूप से शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है।

    डॉ. दिनेश नारायण वर्मा ने औपनिवेशिक आख्यानों की आलोचना की, और कहा कि संथाल हूल आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए एक स्वतःस्फूर्त क्रांति थी।

    प्रो. पीयूष कमल सिन्हा ने एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, और संथाल हूल को औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ पहला संगठित प्रतिरोध बताया।

    संजय कृष्णन ने बताया कि संथाल हूल की नींव 1853 में पड़ी थी, और आंदोलन में योगदान देने वाले कई गुमनाम नायकों का उल्लेख किया।

    प्रो. एसएन मुंडा ने संथाल हूल के महत्व पर ज़ोर दिया, जो आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान को संरक्षित करने का एक साधन था, और सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय संसाधनों की रक्षा की वकालत की।

    संगोष्ठी में डॉ. कमल बोस और डॉ. जय किशोर मंगल ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस आयोजन का उद्देश्य संथाल हूल के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक-राजनीतिक महत्व को उजागर करना और मुख्यधारा के इतिहास में आदिवासी प्रतिरोध आंदोलनों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए प्रोत्साहित करना था।

    Colonialism Cultural Heritage Freedom Struggle Historical Seminar Indigenous Rights jharkhand ranchi Santhal Hul Tribal History Tribal Resistance

    Related Posts

    झारखंड में रातें सिहराने लगीं, पछुआ ने तोड़ा तापमान का रिकॉर्ड

    February 7, 2026

    हेमंत-कल्पना सोरेन ने रजरप्पा मंदिर में मनाई शादी की 22वीं बरसी

    February 7, 2026

    कोडरमा रहस्य: 10 आदिवासी मासूम श्राद्ध के बाद लापता, सनसनी

    February 7, 2026

    Comments are closed.

    Facebook X (Twitter) Instagram Pinterest
    © 2026 ThemeSphere. Designed by ThemeSphere.

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.